मंगळवार, २० नोव्हेंबर, २०१८

नस्लोंका करे जो बंटवारा, रहबर वो कौम का ढोंगी है,



बॉंट दिया इस धरती को,
क्या चॉंद-सितारोंका होगा?
नदियोंके कुछ नाम रखें,
बहती धारोंका क्या होगा?

शिव की गंगा भी पानी है,
आबे-ज़मज़म भी पानी है,
मुल्ला भी पिए, पंडित भी पिए
पानी का मजहब क्या होगा?

इन फिरकापरस्तोंसे* पूछो,
क्या सूरज अलग बनाओगे?
एक हवामें सॉंस है सबकी,
क्या हवा भी नई चलाओगे?

नस्लोंका करे जो बंटवारा,
रहबर वो कौम का ढोंगी है,
क्या ख़ुदा ने मंदिर तोडा था,
क्या रामनें मस्जिद तोडी है?

(कवी स्वत: आशुतोष राणाच आहेत की अन्य कुणी ठाऊक नाही.)

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